मैं ख़ुद से क्यूं पूछू की कौन हूँ मैं ॥
जवाब मिलता भी तो शायद उसे न पाने की आरजू होती ...!!
Monday, May 04, 2009
Tuesday, April 28, 2009
The flute..
Random thoughts for the last hole of a flute....
छन से छनक जाती पायल का संदेस तो नही॥
नयनो से छलकते अश्रु का संवेद तो नही॥
भोर से किसी पग पर छलका कोई राग तो नही॥
मैत्री के किसी वादे का कोई भाग तो नही॥
कर्म पथ का कोई मुश्किल पाठ तो नही॥
हर्षित ह्रदय पर पड़ी कोई गाँठ तो नही॥
गुजरती हुई हर साँस का कोई भेद तो नही॥
कही तुम उस बांसुरी का आखरी छेद तो नही॥
छन से छनक जाती पायल का संदेस तो नही॥
नयनो से छलकते अश्रु का संवेद तो नही॥
भोर से किसी पग पर छलका कोई राग तो नही॥
मैत्री के किसी वादे का कोई भाग तो नही॥
कर्म पथ का कोई मुश्किल पाठ तो नही॥
हर्षित ह्रदय पर पड़ी कोई गाँठ तो नही॥
गुजरती हुई हर साँस का कोई भेद तो नही॥
कही तुम उस बांसुरी का आखरी छेद तो नही॥
Saturday, December 15, 2007
sometimes i quote....
I count the number of steps when I first go up a staircase. Helps me ensure the next time, that the last step is always the right step.
- Abhas.
- Abhas.
Thursday, October 25, 2007
ekaant..
वोही मैं और वोही शुन्य,
मन फ़िर भी आक्रांत सा क्यूं है,
देती गुजरती हर घड़ी मातृत्व के कई वादे,
फिर भी बाल-मन अशांत सा क्यूं है,
धुरी पर घूमती इस धरती पर,
जीवन पथ में यह दिशांत सा क्यूं है,
साक्षी असीम सुख के यह अगणित तारे,
कलरव यह चिडियों का असम्भ्रांत सा क्यूं है,
देखेंगे जीवन डगर पर कई मेले और भी,
जाने आज एक एकांत सा क्यूं है!
- आभास
Saturday, October 13, 2007
तुम...
शायद तुम कांटा कोई,
शायद तुम हो कोई कंकड,
शायद तुम तमाचा कोई,
रखा वक्त ने जिसको जडकर,
शायद तुम शोर दुनिया का,
बेहरा करता कानों को,
शायद कम्पन धरती का तुम,
उजाड्ता जीवन स्थानो को.
हाँ यही सब हो तुम.
जाना प्रेम चुभन को तुमसे,
कंकड तुम वो गिरकर,
दिया जीवन जिसने झील स्थिर को,
तमाचा तुम वक्त का,
एहसास कर्तव्य का दिलाता है,
शोर हो तुम उस दुनिया का,
जहाँ गूंज उल्लास बस आता है.
बन जाओ अब शिव तुम मेरे,
अमृत मन्थन कर दो जीवन विष से,
की फिर नवीन का शोर हो,
तपती हो जहाँ धरा,
बन जाओ मेरे ब्रह्मा,
रचा दो एक स्वर्ग नया.
और मांगू फिर तुमसे,
बस एक आखिरी कम्पन,
की उजाड दो इन मकानो को,
देख कर तुम्हें फिर मैं,
शायद फिर,
जीवन का आभास पा सकूं!
~ आभास
शायद तुम हो कोई कंकड,
शायद तुम तमाचा कोई,
रखा वक्त ने जिसको जडकर,
शायद तुम शोर दुनिया का,
बेहरा करता कानों को,
शायद कम्पन धरती का तुम,
उजाड्ता जीवन स्थानो को.
हाँ यही सब हो तुम.
जाना प्रेम चुभन को तुमसे,
कंकड तुम वो गिरकर,
दिया जीवन जिसने झील स्थिर को,
तमाचा तुम वक्त का,
एहसास कर्तव्य का दिलाता है,
शोर हो तुम उस दुनिया का,
जहाँ गूंज उल्लास बस आता है.
बन जाओ अब शिव तुम मेरे,
अमृत मन्थन कर दो जीवन विष से,
की फिर नवीन का शोर हो,
तपती हो जहाँ धरा,
बन जाओ मेरे ब्रह्मा,
रचा दो एक स्वर्ग नया.
और मांगू फिर तुमसे,
बस एक आखिरी कम्पन,
की उजाड दो इन मकानो को,
देख कर तुम्हें फिर मैं,
शायद फिर,
जीवन का आभास पा सकूं!
~ आभास
Friday, September 21, 2007
driving in delhi with her... in my thoughts :-)
आज फिर वोही दिन है..
वो घूमने निकलना एक सर्दी की दोपहर,
रुक जाना घूमते हुए किन्ही चौराहों पर,
मन्दिर को देख तुमको मांग लेना चुपके से,
और तुम्हें देख बस मुस्करा देना..
खामोश रहना और तुमसे कहना की कुछ कहो,
और तुम्हारा कहना की आज सुनने का मन है,
बस उस गर्म सी हवा की होती थी सरसराहट,
तोड़ती हमारी चुप्पियो को..
दिखती आज फिर वो सड़क जिस पर चले है हम,
और वो तुम्हारा कहना की काश ये दिन ना बीते,
वो शाम का वक्त और रुक जाना किसी जगह,
जा कर तुम्हारे लिए एक चाय की प्याली लाना..
जाने क्यूँ आज फिर वो दिन याद आ गया,
शायद दिल फिर से तुम्हें छूना चाहता होगा,
कह रहा होगा मन से जीने को वो पल,
शायद आज फिर तुम्हारे साथ घूमना चाहता होगा..
कुछ भी तो बातें नही हुई,
पर जीं ली थी जिन्दगी,
और देखो आज फिर खड़े उन दोराहो पर,
मैं और तुम फिर बनके अजनबी..
- आभास
वो घूमने निकलना एक सर्दी की दोपहर,
रुक जाना घूमते हुए किन्ही चौराहों पर,
मन्दिर को देख तुमको मांग लेना चुपके से,
और तुम्हें देख बस मुस्करा देना..
खामोश रहना और तुमसे कहना की कुछ कहो,
और तुम्हारा कहना की आज सुनने का मन है,
बस उस गर्म सी हवा की होती थी सरसराहट,
तोड़ती हमारी चुप्पियो को..
दिखती आज फिर वो सड़क जिस पर चले है हम,
और वो तुम्हारा कहना की काश ये दिन ना बीते,
वो शाम का वक्त और रुक जाना किसी जगह,
जा कर तुम्हारे लिए एक चाय की प्याली लाना..
जाने क्यूँ आज फिर वो दिन याद आ गया,
शायद दिल फिर से तुम्हें छूना चाहता होगा,
कह रहा होगा मन से जीने को वो पल,
शायद आज फिर तुम्हारे साथ घूमना चाहता होगा..
कुछ भी तो बातें नही हुई,
पर जीं ली थी जिन्दगी,
और देखो आज फिर खड़े उन दोराहो पर,
मैं और तुम फिर बनके अजनबी..
- आभास
Thursday, September 20, 2007
life takes you places
Had given up updating my blogs recently, and then suddenly a friend came to me, all elated..
"We have got the Permanent Resident Status in Australia. Life would be so good now." And that made me think.
Life really takes you places.
I remember once going to meet Sonu in Laxmangarh, and there I met this friend of mine. Struggling was not easy in the scorching heat of the sun in that remote village, which is now growing to a small town, all due to this girls college so aptly placed there. Aptly for me, for I got some of the most memorable days and friends in this place. So there was my friend, a few years back, all sweating but smiling at the prevailing happiness in the atmosphere then. And now here is my friend, chatting with me sitting in an AC room from Australia, smiling with hints of relief and happiness.
We were teens then when we laughed together, and now all of us have different paths. Paths so different that I doubt seeing them all together again. But wherever I am, and wherever You are, I wish you happiness. May the Force be with you for Life really takes you places.
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